• चेत करु जोगी, बिलैया मारै मटकी
  • साधु बाबा हो बिषय बिलरवा, दहिया खैलकै मोर
  • हाँ रे! नसरल हटिया उसरी गेलै रे दइवा
  • बड़ी रे विपतिया रे हंसा, नहिरा गँवाइल रे
  • सोना ऐसन देहिया हो संतो भइया / कबीर
  • का लै जैबौ, ससुर घर ऐबौ
  • अँधियरवा में ठाढ़ गोरी का करलू
  • रहली मैं कुबुद्ध संग रहली
  • पाँच ही तत्त के लागल हटिया
  • धोबिया हो बैराग
  • तोर हीरा हिराइल बा किचड़े में
  • घर पिछुआरी लोहरवा भैया हो मितवा
  • सुगवा पिंजरवा छोरि भागा
  • मोरी चुनरी में परि गयो दाग पिया
  • मुनियाँ पिंजड़ेवाली ना, तेरो सतगुरु है बेपारी
  • हंसा चलल ससुररिया रे, नैहरवा डोलम डोल
  • अबिनासी दुलहा कब मिलिहौ, भक्तन के रछपाल
  • ननदी गे तैं विषम सोहागिनि
  • सतगुर के सँग क्यों न गई री

कबीर दास का निधन

कबीर दास जी का निधन सन 1518 ई. में हुआ था। बे अपने निधन ने समय में मगहर चके गए थे। कहा जाता है की उनके सब को लेकर बिबाद हो गया था था। हिन्दू लोग अपनी प्रथा के अनुसार उनके शव को जलाना चहाते थे और मुस्लिम शव को दफनाना चाहते थे। काफी देर के बाद साहव से जब चादर को हटाकर देखा गया तो शव की जगह पर कुछ फूल मिले। हिन्दू और मुस्लिम दोनों ने फूलो को बाँट लिया और अपने पाने

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संत कबीर दास जी के दोहे इन हिंदी 

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ: जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।


पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

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